शाम-ऐ-गम कहो ना कुछ

वोह बारिश के पानी में पिया ने बुझा दिया अपने दिल के उजाले को
वोह लेपा हुआ आँगन सपनो की झील में खोया हुआ
पिया से सांझ की खुश्बू में कहे है –

एक सर्द मौसम आया था तूफ़ान लेके कुछ सालों पहले
जब तुम आई थी दुल्हन के लाल जोड़े में
गुमसुम से पायलों की छनकार पैरों में बाँध के
गहनों की लेप में उतरे हुए कन्धो पे
पिया से जब आँख चुराए शर्मा के नयी ज़िन्दगी
पुकार रही थो वोह चार दिवारी में
वोह संभाले हुए अपने संस्कार
समाज के दस्तूर में रचे हुए
वोह नथिनी और कान की बालिया
वोह आशाओं से घिरी हुई आखें
अरमानो से सुसज्जित कमरबन्द
क्या बताऊं में
उस रात तुम आई थी लांघ के
एक परिवार के बीस साल का प्यार

बारिश थम गयी
पर प्यार ना आया बेहके वापस
कहा और क्यों जलाऊं अपने घर की बत्तीयाँ
यह मौसम की डोर में बंधे हुए हम कठपुतले
क्या मांगे इनसे

बस ज़िन्दगी का मतलब एक सखी ने कहा था मुझे –
के यह मौसम के बहाव में खो जाना
ज़िन्दगी की पतंग दिल से जोड़ देना
और युही पल कट जायेंगे ख़ुशी की डोर में

पर खो रही हु में अपने परछाई के इंतज़ार में
बस इंतज़ार में
के यह खामोशी भी बड़ी नाज़ुक होती है
शाम-ऐ-गम कहो ना कुछ
क्या पिया लौटेंगे अगले सावन की बूंदों में ?

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11 thoughts on “शाम-ऐ-गम कहो ना कुछ

  1. Kabhi mein rah dekhu apne dhadkano ki,
    kabhi intezar karun un gadhiyon ki,
    jis pal piya aayenge angana,
    liye bauchar phoolon aur chand boondon ki!!

    intense feeling of separation! well reflected! pawan.

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